Vaibhav Lakshmi Vrat Katha in Hindiवैभव लक्ष्मी व्रत कथा
Below is the complete Vaibhav Lakshmi Vrat Katha in Hindi, the story of Sheela that devotees read at every Friday puja; for the same story in English, see the English katha.
Download the Vaibhav Lakshmi Vrat Katha PDF (with puja vidhi, samagri and aarti)
शीला और उसका सुखी घर
एक बड़े शहर में शीला नाम की एक स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। शीला स्वभाव से धार्मिक, शांत और संतोषी थी। वह सुबह-शाम भगवान का नाम लेती, घर को साफ-सुथरा रखती और जो कुछ मिलता, उसी में प्रसन्न रहती। उसका पति भी पहले बहुत समझदार और सज्जन था। वह ईमानदारी से काम करता, किसी की बुराई नहीं करता और शीला का पूरा सम्मान करता था। दोनों का जीवन प्रेम से भरा था और पड़ोसी उनके घर को एक आदर्श गृहस्थी मानते थे।
पर कहते हैं, समय सदा एक-सा नहीं रहता।
बुरी संगत और घर की बर्बादी
कुछ समय बाद शीला का पति बुरे लोगों की संगत में पड़ गया। उन मित्रों के साथ रहकर वह जुआ खेलने लगा, शराब पीने लगा और घुड़दौड़ में सट्टा लगाने लगा। जल्दी अमीर बनने के लालच में उसने अपनी सारी कमाई और घर की जमा-पूंजी गँवा दी। जब पैसा खत्म हो गया तो वह शीला के गहने भी एक-एक करके ले गया, उन्हें बेच दिया और वह पैसा भी जुए और नशे में उड़ा दिया।
जो घर कभी सुख और शांति से भरा रहता था, उसमें अब गरीबी और कलह ने डेरा डाल लिया। कई दिन तो घर में ठीक से चूल्हा भी नहीं जलता था। पति नशे में देर रात घर लौटता, बात-बात पर चिल्लाता और शीला का अपमान करता। पड़ोसी भी अब उनसे कतराने लगे थे।
फिर भी शीला ने धीरज नहीं छोड़ा। वह चुपचाप सब कुछ सहती रही और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती रही: "हे प्रभु, मेरे पति को सद्बुद्धि दो और हमारे घर में फिर से सुख-शांति लौटा दो।" उसे विश्वास था कि जैसे सुख के बाद दुख आता है, वैसे ही दुख के बाद सुख भी अवश्य आएगा।
द्वार पर आईं एक बूढ़ी माँ
एक दिन दोपहर को किसी ने शीला का दरवाज़ा खटखटाया। शीला सोचने लगी कि इस गरीबी में मेरे घर कौन आया होगा। दरवाज़ा खोला तो सामने एक बूढ़ी माँ खड़ी थीं। उनके चेहरे पर अद्भुत तेज था, आँखों से जैसे स्नेह बरस रहा था और उनका पूरा मुख करुणा से भरा था। उन्हें देखते ही शीला का मन शांत हो गया।
घर में अतिथि के लिए बिछाने को कुछ नहीं बचा था, फिर भी शीला ने आदर से उन्हें भीतर बुलाया और एक पुरानी, फटी चादर बिछाकर बैठाया। माँजी बोलीं, "बेटी शीला, क्या तूने मुझे पहचाना नहीं?" शीला संकोच में पड़ गई, उसे कुछ याद नहीं आ रहा था। माँजी ने मुस्कुराकर कहा, "हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन होता है। तू भी वहाँ आया करती थी और मैं भी आती हूँ। बहुत दिनों से तू दिखाई नहीं दी, इसलिए तेरा हाल पूछने चली आई।"
माँजी का प्रेम भरा स्वर सुनकर शीला का हृदय भर आया और वह फूट-फूटकर रोने लगी। माँजी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, "बेटी, सुख और दुख तो धूप-छाँव की तरह आते-जाते रहते हैं। अपना दुख मुझसे कह दे, मन हल्का हो जाएगा।" तब शीला ने अपने पति की बुरी संगत, घर की बर्बादी और अपनी सारी पीड़ा उन्हें कह सुनाई।
माँजी ने बताया वैभव लक्ष्मी व्रत
सारी बात सुनकर माँजी बोलीं, "बेटी, कर्म की गति बड़ी न्यारी है, पर तू धीरज रख। तू माँ लक्ष्मी की भक्त है। माँ लक्ष्मी प्रेम और करुणा की मूर्ति हैं और अपने भक्तों पर सदा ममता रखती हैं। तू विधिपूर्वक वैभव लक्ष्मी व्रत कर। माँ की कृपा से तेरे सब दुख दूर हो जाएँगे।"
शीला ने हाथ जोड़कर व्रत की विधि पूछी। माँजी ने प्रेम से समझाया:
"यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है। मन में संकल्प करो कि मैं इतने शुक्रवार, ग्यारह या इक्कीस, श्रद्धा से यह व्रत करूँगी। उस दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनो और दिन भर मन में 'जय माँ लक्ष्मी' का स्मरण करती रहो। किसी की निंदा या चुगली मत करो और मन में बुरे विचार मत आने दो।"
"शाम को पूर्व दिशा की ओर मुँह करके आसन पर बैठो। सामने चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ लक्ष्मी का चित्र रखो। चावल की एक छोटी-सी ढेरी बनाकर उस पर जल से भरा तांबे का कलश रखो। कलश पर एक कटोरी रखो और उसमें सोने या चांदी का कोई गहना रखो। गहना न हो तो एक सिक्का रख लो। फिर घी का दीपक और धूप जलाओ, फूल और कुमकुम चढ़ाओ। श्रीयंत्र और माँ लक्ष्मी के आठों स्वरूपों को श्रद्धा से प्रणाम करो। फिर वैभव लक्ष्मी व्रत कथा पढ़ो, माँ की स्तुति करो और खीर या कोई मीठा प्रसाद चढ़ाओ। आरती करके कलश का जल तुलसी में डाल दो और प्रसाद सबको बाँटकर स्वयं भी ग्रहण करो।"
"जितने शुक्रवार का संकल्प लिया हो, वे पूरे होने पर अंतिम शुक्रवार को विधि से उद्यापन करो। उस दिन खीर का प्रसाद बनाओ, नारियल चढ़ाओ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सात, ग्यारह, इक्कीस या उससे अधिक स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक भेंट करो, ताकि माँ की महिमा और यह व्रत घर-घर पहुँचे। फिर माँ से प्रार्थना करो कि जैसे आपने मेरी मनोकामना पूरी की, वैसे ही सबकी करना।"
इतना कहकर माँजी ने शीला को आशीर्वाद दिया और चली गईं। शीला ने मन ही मन इक्कीस शुक्रवार वैभव लक्ष्मी व्रत करने का संकल्प ले लिया।
पहले शुक्रवार से बदलने लगा भाग्य
अगले दिन शुक्रवार था। शीला ने सुबह स्नान किया, साफ कपड़े पहने और दिन भर 'जय माँ लक्ष्मी' का जाप करती रही। घर में अब कोई गहना नहीं बचा था, इसलिए शाम को उसने माँजी के कहे अनुसार कटोरी में एक सिक्का रखा और पूरी श्रद्धा से पूजा की। उसने कथा पढ़ी, शक्कर का प्रसाद चढ़ाया, आरती की, कलश का जल तुलसी में डाला और प्रसाद सबसे पहले अपने पति को दिया।
प्रसाद खाते ही जैसे पति के मन पर से कोई परदा हट गया। उस रात उसने शीला को न डाँटा, न उसका अपमान किया। शीला ने मन ही मन माँ लक्ष्मी को धन्यवाद दिया और उसका विश्वास और भी दृढ़ हो गया।
शीला हर शुक्रवार उसी श्रद्धा से व्रत करती रही। धीरे-धीरे उसके पति का स्वभाव बदलने लगा। उसने बुरे मित्रों का साथ छोड़ दिया, जुए और शराब से दूर हो गया और अपने किए पर पछताने लगा। फिर वह मन लगाकर ईमानदारी और मेहनत से काम करने लगा। माँ लक्ष्मी की कृपा से उसके काम में बरकत होने लगी। अपनी कमाई से उसने शीला के लिए फिर से गहने बनवाए। घर में एक बार फिर अन्न-धन भरने लगा और पुराना सुख और प्रेम लौट आया।
उद्यापन और माँजी का रहस्य
इक्कीस शुक्रवार पूरे होने पर शीला ने अंतिम शुक्रवार को विधिपूर्वक उद्यापन किया। उसने खीर का प्रसाद बनाया, माँ को नारियल चढ़ाया और माँजी के बताए अनुसार सात स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तकें भेंट कीं। फिर उसने माँ लक्ष्मी के चित्र के सामने हाथ जोड़कर कहा, "हे माँ, जैसे आपने मेरी मनोकामना पूरी की, वैसे ही अपने सब भक्तों की करना।"
पूजा के बाद जब शीला ने माँ के चित्र को निहारा, तो उसे उसमें वही करुणा भरी मुस्कान दिखी जो उस दिन बूढ़ी माँ के चेहरे पर थी। तब उसकी समझ में आया कि उस दिन उसके द्वार पर आने वाली माँजी कोई साधारण स्त्री नहीं, स्वयं माँ लक्ष्मी थीं, जो अपनी दुखी भक्त को राह दिखाने आई थीं। शीला का मन भक्ति से भर गया और उसने माँ के चरणों में बार-बार प्रणाम किया।
उस दिन के बाद शीला और उसका पति सुख, सम्मान और प्रेम से जीवन बिताने लगे। दोनों ने आगे भी यह व्रत श्रद्धा से करने का निश्चय किया, और जब भी शीला को कोई दुखी स्त्री मिलती, वह उसे वैभव लक्ष्मी व्रत के बारे में बताती।
हे माँ वैभव लक्ष्मी, जैसे आपने शीला पर कृपा की, उसके पति को सद्बुद्धि दी और उसके घर में सुख-समृद्धि लौटाई, वैसे ही इस कथा को पढ़ने और सुनने वाले सब भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखना। सबके घर में सुख, शांति और सद्भाव बना रहे।
बोलो, जय माँ वैभव लक्ष्मी!
How to read the katha during the puja
The katha is the heart of the Friday puja. It is read after the altar has been set up and the goddess has been worshipped, and before the aarti. The full sequence of the puja is explained on the Vaibhav Lakshmi vrat vidhi page; the points below cover the katha itself. Customs vary between families, so follow your own tradition where it differs.
- Light the ghee lamp and incense, offer flowers, kumkum and haldi, and bow to the Shri Yantra and the eight forms of Maa Lakshmi before you begin.
- Many devotees hold a few grains of akshat (unbroken rice) and a flower in their folded hands while reading or listening, and offer them before the goddess at the end.
- Read slowly and clearly, aloud if family members are listening, or softly in a calm voice if you are alone.
- Try not to get up or talk in between; keep your mind on the story and on the goddess.
- Read in the language you understand best. The same story is available as the Vaibhav Lakshmi Vrat Katha in English.
- After the katha, recite the vrat mantra given below, or a simple mantra such as ॐ श्रीं श्रियै नमः, then sing the aarti "Om Jai Lakshmi Mata".
- Offer the prasad, pour the water of the kalash into the tulsi plant and share the prasad with everyone present.
The vrat mantra used in the booklet tradition is:
या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥
या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती॥
Meaning: May the lovely Goddess Lakshmi, Padmavati, protect me: she who dwells on the red lotus, who is full of grace and shines like the blazing sun, who is dressed in red, the beloved companion of Hari, who gladdens the heart, and who arose from the churning of the ocean to become the consort of Vishnu.
On the last Friday of your sankalp the katha is read in the same way, and copies of the katha book are then gifted as part of the udyapan vidhi.
Closing prayer
After the aarti, many devotees end the puja with a short prayer in their own words, thanking the goddess and asking forgiveness for any mistake made during the worship. A simple prayer in Hindi could be:
हे माँ वैभव लक्ष्मी, मैंने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा की है।
पूजा में जाने-अनजाने जो भूल हुई हो, उसे क्षमा करना।
मेरे घर-परिवार में सुख, शांति, सद्बुद्धि और सद्भाव बनाए रखना।
जैसे आपने शीला पर कृपा की, वैसे ही सब भक्तों पर कृपा करना।
जय माँ वैभव लक्ष्मी।
Meaning: O Maa Vaibhav Lakshmi, I have worshipped you as far as my faith and means allow. Please forgive any mistake made in this puja, knowingly or unknowingly. Keep happiness, peace, good sense and harmony in my home and family. As you showed grace to Sheela, show grace to all your devotees. Jai Maa Vaibhav Lakshmi.
You may say it in English or in any language you are comfortable with; the feeling behind the words matters more than the exact wording.
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वैभव लक्ष्मी व्रत कथा PDF डाउनलोड करें (पूजा विधि, सामग्री और आरती सहित)
शीला और उसका सुखी घर
एक बड़े शहर में शीला नाम की एक स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। शीला स्वभाव से धार्मिक, शांत और संतोषी थी। वह सुबह-शाम भगवान का नाम लेती, घर को साफ-सुथरा रखती और जो कुछ मिलता, उसी में प्रसन्न रहती। उसका पति भी पहले बहुत समझदार और सज्जन था। वह ईमानदारी से काम करता, किसी की बुराई नहीं करता और शीला का पूरा सम्मान करता था। दोनों का जीवन प्रेम से भरा था और पड़ोसी उनके घर को एक आदर्श गृहस्थी मानते थे।
पर कहते हैं, समय सदा एक-सा नहीं रहता।
बुरी संगत और घर की बर्बादी
कुछ समय बाद शीला का पति बुरे लोगों की संगत में पड़ गया। उन मित्रों के साथ रहकर वह जुआ खेलने लगा, शराब पीने लगा और घुड़दौड़ में सट्टा लगाने लगा। जल्दी अमीर बनने के लालच में उसने अपनी सारी कमाई और घर की जमा-पूंजी गँवा दी। जब पैसा खत्म हो गया तो वह शीला के गहने भी एक-एक करके ले गया, उन्हें बेच दिया और वह पैसा भी जुए और नशे में उड़ा दिया।
जो घर कभी सुख और शांति से भरा रहता था, उसमें अब गरीबी और कलह ने डेरा डाल लिया। कई दिन तो घर में ठीक से चूल्हा भी नहीं जलता था। पति नशे में देर रात घर लौटता, बात-बात पर चिल्लाता और शीला का अपमान करता। पड़ोसी भी अब उनसे कतराने लगे थे।
फिर भी शीला ने धीरज नहीं छोड़ा। वह चुपचाप सब कुछ सहती रही और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती रही: "हे प्रभु, मेरे पति को सद्बुद्धि दो और हमारे घर में फिर से सुख-शांति लौटा दो।" उसे विश्वास था कि जैसे सुख के बाद दुख आता है, वैसे ही दुख के बाद सुख भी अवश्य आएगा।
द्वार पर आईं एक बूढ़ी माँ
एक दिन दोपहर को किसी ने शीला का दरवाज़ा खटखटाया। शीला सोचने लगी कि इस गरीबी में मेरे घर कौन आया होगा। दरवाज़ा खोला तो सामने एक बूढ़ी माँ खड़ी थीं। उनके चेहरे पर अद्भुत तेज था, आँखों से जैसे स्नेह बरस रहा था और उनका पूरा मुख करुणा से भरा था। उन्हें देखते ही शीला का मन शांत हो गया।
घर में अतिथि के लिए बिछाने को कुछ नहीं बचा था, फिर भी शीला ने आदर से उन्हें भीतर बुलाया और एक पुरानी, फटी चादर बिछाकर बैठाया। माँजी बोलीं, "बेटी शीला, क्या तूने मुझे पहचाना नहीं?" शीला संकोच में पड़ गई, उसे कुछ याद नहीं आ रहा था। माँजी ने मुस्कुराकर कहा, "हर शुक्रवार को लक्ष्मीजी के मंदिर में भजन-कीर्तन होता है। तू भी वहाँ आया करती थी और मैं भी आती हूँ। बहुत दिनों से तू दिखाई नहीं दी, इसलिए तेरा हाल पूछने चली आई।"
माँजी का प्रेम भरा स्वर सुनकर शीला का हृदय भर आया और वह फूट-फूटकर रोने लगी। माँजी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और कहा, "बेटी, सुख और दुख तो धूप-छाँव की तरह आते-जाते रहते हैं। अपना दुख मुझसे कह दे, मन हल्का हो जाएगा।" तब शीला ने अपने पति की बुरी संगत, घर की बर्बादी और अपनी सारी पीड़ा उन्हें कह सुनाई।
माँजी ने बताया वैभव लक्ष्मी व्रत
सारी बात सुनकर माँजी बोलीं, "बेटी, कर्म की गति बड़ी न्यारी है, पर तू धीरज रख। तू माँ लक्ष्मी की भक्त है। माँ लक्ष्मी प्रेम और करुणा की मूर्ति हैं और अपने भक्तों पर सदा ममता रखती हैं। तू विधिपूर्वक वैभव लक्ष्मी व्रत कर। माँ की कृपा से तेरे सब दुख दूर हो जाएँगे।"
शीला ने हाथ जोड़कर व्रत की विधि पूछी। माँजी ने प्रेम से समझाया:
"यह व्रत शुक्रवार को किया जाता है। मन में संकल्प करो कि मैं इतने शुक्रवार, ग्यारह या इक्कीस, श्रद्धा से यह व्रत करूँगी। उस दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनो और दिन भर मन में 'जय माँ लक्ष्मी' का स्मरण करती रहो। किसी की निंदा या चुगली मत करो और मन में बुरे विचार मत आने दो।"
"शाम को पूर्व दिशा की ओर मुँह करके आसन पर बैठो। सामने चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ लक्ष्मी का चित्र रखो। चावल की एक छोटी-सी ढेरी बनाकर उस पर जल से भरा तांबे का कलश रखो। कलश पर एक कटोरी रखो और उसमें सोने या चांदी का कोई गहना रखो। गहना न हो तो एक सिक्का रख लो। फिर घी का दीपक और धूप जलाओ, फूल और कुमकुम चढ़ाओ। श्रीयंत्र और माँ लक्ष्मी के आठों स्वरूपों को श्रद्धा से प्रणाम करो। फिर वैभव लक्ष्मी व्रत कथा पढ़ो, माँ की स्तुति करो और खीर या कोई मीठा प्रसाद चढ़ाओ। आरती करके कलश का जल तुलसी में डाल दो और प्रसाद सबको बाँटकर स्वयं भी ग्रहण करो।"
"जितने शुक्रवार का संकल्प लिया हो, वे पूरे होने पर अंतिम शुक्रवार को विधि से उद्यापन करो। उस दिन खीर का प्रसाद बनाओ, नारियल चढ़ाओ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार सात, ग्यारह, इक्कीस या उससे अधिक स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक भेंट करो, ताकि माँ की महिमा और यह व्रत घर-घर पहुँचे। फिर माँ से प्रार्थना करो कि जैसे आपने मेरी मनोकामना पूरी की, वैसे ही सबकी करना।"
इतना कहकर माँजी ने शीला को आशीर्वाद दिया और चली गईं। शीला ने मन ही मन इक्कीस शुक्रवार वैभव लक्ष्मी व्रत करने का संकल्प ले लिया।
पहले शुक्रवार से बदलने लगा भाग्य
अगले दिन शुक्रवार था। शीला ने सुबह स्नान किया, साफ कपड़े पहने और दिन भर 'जय माँ लक्ष्मी' का जाप करती रही। घर में अब कोई गहना नहीं बचा था, इसलिए शाम को उसने माँजी के कहे अनुसार कटोरी में एक सिक्का रखा और पूरी श्रद्धा से पूजा की। उसने कथा पढ़ी, शक्कर का प्रसाद चढ़ाया, आरती की, कलश का जल तुलसी में डाला और प्रसाद सबसे पहले अपने पति को दिया।
प्रसाद खाते ही जैसे पति के मन पर से कोई परदा हट गया। उस रात उसने शीला को न डाँटा, न उसका अपमान किया। शीला ने मन ही मन माँ लक्ष्मी को धन्यवाद दिया और उसका विश्वास और भी दृढ़ हो गया।
शीला हर शुक्रवार उसी श्रद्धा से व्रत करती रही। धीरे-धीरे उसके पति का स्वभाव बदलने लगा। उसने बुरे मित्रों का साथ छोड़ दिया, जुए और शराब से दूर हो गया और अपने किए पर पछताने लगा। फिर वह मन लगाकर ईमानदारी और मेहनत से काम करने लगा। माँ लक्ष्मी की कृपा से उसके काम में बरकत होने लगी। अपनी कमाई से उसने शीला के लिए फिर से गहने बनवाए। घर में एक बार फिर अन्न-धन भरने लगा और पुराना सुख और प्रेम लौट आया।
उद्यापन और माँजी का रहस्य
इक्कीस शुक्रवार पूरे होने पर शीला ने अंतिम शुक्रवार को विधिपूर्वक उद्यापन किया। उसने खीर का प्रसाद बनाया, माँ को नारियल चढ़ाया और माँजी के बताए अनुसार सात स्त्रियों को कुमकुम का तिलक लगाकर वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तकें भेंट कीं। फिर उसने माँ लक्ष्मी के चित्र के सामने हाथ जोड़कर कहा, "हे माँ, जैसे आपने मेरी मनोकामना पूरी की, वैसे ही अपने सब भक्तों की करना।"
पूजा के बाद जब शीला ने माँ के चित्र को निहारा, तो उसे उसमें वही करुणा भरी मुस्कान दिखी जो उस दिन बूढ़ी माँ के चेहरे पर थी। तब उसकी समझ में आया कि उस दिन उसके द्वार पर आने वाली माँजी कोई साधारण स्त्री नहीं, स्वयं माँ लक्ष्मी थीं, जो अपनी दुखी भक्त को राह दिखाने आई थीं। शीला का मन भक्ति से भर गया और उसने माँ के चरणों में बार-बार प्रणाम किया।
उस दिन के बाद शीला और उसका पति सुख, सम्मान और प्रेम से जीवन बिताने लगे। दोनों ने आगे भी यह व्रत श्रद्धा से करने का निश्चय किया, और जब भी शीला को कोई दुखी स्त्री मिलती, वह उसे वैभव लक्ष्मी व्रत के बारे में बताती।
हे माँ वैभव लक्ष्मी, जैसे आपने शीला पर कृपा की, उसके पति को सद्बुद्धि दी और उसके घर में सुख-समृद्धि लौटाई, वैसे ही इस कथा को पढ़ने और सुनने वाले सब भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखना। सबके घर में सुख, शांति और सद्भाव बना रहे।
बोलो, जय माँ वैभव लक्ष्मी!
पूजा में कथा कैसे पढ़ें
कथा शुक्रवार की पूजा का मुख्य भाग है। चौकी सजाने और माँ की पूजा करने के बाद, आरती से पहले कथा पढ़ी जाती है। पूजा का पूरा क्रम वैभव लक्ष्मी व्रत विधि पेज पर दिया गया है; नीचे केवल कथा पढ़ने से जुड़ी बातें हैं। हर परिवार की परंपरा थोड़ी अलग होती है, इसलिए जहाँ अंतर हो, वहाँ अपने घर की रीति मानें।
- कथा शुरू करने से पहले घी का दीपक और धूप जलाएँ, फूल, कुमकुम और हल्दी चढ़ाएँ और श्रीयंत्र तथा माँ लक्ष्मी के आठों स्वरूपों को प्रणाम करें।
- बहुत से भक्त कथा पढ़ते या सुनते समय जुड़े हाथों में थोड़े अक्षत (साबुत चावल) और एक फूल रखते हैं और कथा पूरी होने पर उन्हें माँ के सामने अर्पित कर देते हैं।
- कथा धीरे और साफ स्वर में पढ़ें। परिवार के लोग सुन रहे हों तो ऊँचे स्वर में, अकेले हों तो धीमे और शांत स्वर में।
- बीच में उठने या बात करने से बचें; मन कथा और माँ में लगाए रखें।
- जो भाषा आप सबसे अच्छी तरह समझते हों, उसी में कथा पढ़ें। यही कथा अंग्रेज़ी में भी उपलब्ध है।
- कथा के बाद नीचे दिया व्रत मंत्र या ॐ श्रीं श्रियै नमः जैसा सरल मंत्र बोलें, फिर "ॐ जय लक्ष्मी माता" आरती गाएँ।
- प्रसाद चढ़ाएँ, कलश का जल तुलसी में डालें और प्रसाद सबको बाँटें।
पुस्तिका परंपरा में बोला जाने वाला व्रत मंत्र यह है:
या रक्ताम्बुजवासिनी विलासिनी चण्डांशु तेजस्विनी।
या रक्ता रुधिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोल्हादिनी॥
या रत्नाकरमन्थनात्प्रगटिता विष्णोस्वया गेहिनी।
सा मां पातु मनोरमा भगवती लक्ष्मीश्च पद्मावती॥
भावार्थ: जो लाल कमल पर विराजती हैं, जो शोभामयी हैं और प्रचंड सूर्य जैसे तेज वाली हैं, जो लाल वस्त्र धारण करती हैं, जो श्रीहरि की प्रिय सखी हैं और मन को आनंद देती हैं, जो समुद्र मंथन से प्रकट होकर भगवान विष्णु की गृहिणी बनीं, वे मनोहर भगवती पद्मावती लक्ष्मी मेरी रक्षा करें।
संकल्प के अंतिम शुक्रवार को भी कथा इसी तरह पढ़ी जाती है और फिर उद्यापन विधि के अंतर्गत कथा की पुस्तकें भेंट की जाती हैं।
समापन प्रार्थना
आरती के बाद बहुत से भक्त अपने शब्दों में एक छोटी प्रार्थना करके पूजा पूरी करते हैं, जिसमें माँ को धन्यवाद दिया जाता है और पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा माँगी जाती है। एक सरल प्रार्थना इस तरह हो सकती है:
हे माँ वैभव लक्ष्मी, मैंने अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा की है।
पूजा में जाने-अनजाने जो भूल हुई हो, उसे क्षमा करना।
मेरे घर-परिवार में सुख, शांति, सद्बुद्धि और सद्भाव बनाए रखना।
जैसे आपने शीला पर कृपा की, वैसे ही सब भक्तों पर कृपा करना।
जय माँ वैभव लक्ष्मी।
आप अपने शब्दों में भी प्रार्थना कर सकते हैं। शब्दों से अधिक महत्व मन के भाव का है।
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