Vaibhav Lakshmi Vrat Katha – वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

Long ago, there once was a big city that served as home for many people. In ancient times, the people who lived in this city carried a social and happy life with meetings that brought everyone together.

However, nowadays, the citizens were completely focused on their problems. Values such as faith, kindness, empathy, and disinterested appreciation started to be less frequent and became hard to find. Improper actions and vices like gambling, alcohol drinking, and illegal relations were done increasingly often.

Despite the evil vices that abounded in the city as dark and imposing clouds, there is always a light that will spread hope. The people that carried a virtuous and modest life where parts of the light, standing out like a beautiful lotus flower in the middle of the mud pound.

One of these good people was Sheela and her husband. They had an honest way of living and dedicated their humble and happy life to please and worship God. Sheela’s life went by happily, but the destiny written by the Goddess of Fortune can take unexpected turns.

Her husband befriended bad influences, and that changed him, he now desired significant wealth and started to enjoy drinking and gambling. He wasted the money and savings they had as a family, even Sheela’s ornaments, and led the family into poverty and misery.

Sheela suffered a lot for her husband’s abusive actions, but she kept her faith in God. She knew that after hardships come happiness, which is the eternal truth. Hence, she committed to pray for a better life.

One afternoon, someone knocked at her door. She was surprised someone wanted to visit her since she was so poor and had nothing to offer. She meted an older woman standing in the door. This woman’s face was dazzling with glow and divine light, and her eyes were warm and filled with compassion and love. Sheela felt an overflowing peace and welcomed the old lady without hesitation.

The old lady exclaimed, “Sheela! Don’t you know me?” and Sheela admitted she didn’t know the old lady. With a gentle smile, the old woman explained, “Did you forget about me? Every Friday, I used to come to the temple of Goddess Lakshmi, there we happened to meet each other!”

Sheela couldn’t remember seeing the old lady, and she didn’t assist the temple anymore since she was ashamed to spend time with others. The old woman kept explaining, “How sweet you had been singing prayers of Goddess Lakshmi in the temple! Nowadays you have not seen there, so I had come to see you”, Sheela started crying and narrated the lady how she had a happy life, but everything changed when her husband chose the wrong path. The old lady said how she could change all their life if she made the observance of the Vaibhava Lakshmi Vrat (Vrat giving wealth) would help her recover her content lifestyle and make her wish come true.

Sheela followed each Friday all the instructions the old lady gave her and observed with the biggest devotion and dedication. The changes were immediate, as her husband changed and did not beat her anymore. He was a new man and changed his lifestyle for the better. Now he treasured her wife and worked hard to become wealthy.

Sheela thanked Goddess Lakshmi for her blessing and her merciful protection. Having seen the divine power of the Vaibhava Lakshmi Vrat, more families and women began to perform the Vrat as well, multiplying the Goddess blessing and making many wishes come true.

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श्री वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

कमला बेहद सुशील और संतोषी प्रवृत्ति की स्वी थी। वह भगवान बिष्णु की सच्ची भक्त थी। अपने पति सोहनलाल के साथ गांव में रहते उसने और उसके परिवार ने सदा दुख ही झेले थे। तब पति-पल्मी ने आपस में सलाह की और अपने बच्चों को लेकर एक बड़े शहर में आ गए। शहर में आकर सोहनलाल ने एक ढाबा खोल लिया था, जिससे अच्छी आमदनी होने लगी थी। यह सव श्री नारायणजी की कृपा का ही फल था जो कमला के आराध्य थे। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, मगर कमला को एक ही दुख था कि ज्यों-ज्यों उसके घर में धन बढता जा रहा था, त्योंत्यों उसके पति की लालसा भी बढती जा रही थी। उसने अपने कमाए धन को जुए, सट्टे और लॉटरियों में लगाना शुरू कर दिया था।

कमला अपने पति की लालची प्रवृत्ति से डरा करती थी। मौके बे मौके वह उसे समझाती भी थी मगर सोहन लाल पर उसके समझाने का कोई असर नहीं होता था। वह कहता- तुम पागल हो कमला ! अरे, इतने बड़े शहर में आकर भी अगर हमने कोठी-कार न बनाईं तो धिक्कार है हमारे गांव छोड़ने पर

जब ईश्वर की कृपा होगी, तो वह इसी काम में इतनी बरकत दे देगा कि हम यह सब भी बना और खरीद लेंगे। कमला कहती।

ईश्वर क्या कृपा करेगा? कर्मवीर अपने बल पर ही ये सब प्राप्त करते हैं।

सोहनलाल अहंकार भरी बातें करता तो कमला मन मसोस कर रह जाती। सोहनलाल के कदम दिन-ब-दिन बहकते चले गए। उसे जब भी जुए, सट्टे या लॉटरी में नुकसान होता, वह शराब पी लेता। इस प्रकार उसका ध्यान अपने धंधे कौ तरफ से भी हटता चला गया। जो ढाबा कल तक फायदे में चल रहा था, वह धीरे-धीरे नुकसान देने लगा। इसी गम में कभो-कभो सोहनलाल दिन में भी शराब पो लेता था, जिस कारण उसकी दुकान पर ग्राहकों का आना और भी कम हो गया। इस पर भी सोहनलाल को कोई समझ नहीं आईं। बह बिक्री के पैसों सै जुआ या लॉटरी खेल लेता और शराब पी लेता। घर में पैसा देना उसने बिल्कुल बद कर दिया। कमला पैसों का जिक्र करती, तो वह काम मंदा होने का बहाना बना देता। ढाबे का सारा सामान एक दुकान से उधार आता था। जब दुकानदार को उसके जुए की लत और शराब पीने का पता चला तो उसने उधार देना बंद कर दिया। ढाबे के कारीगर भी पैसा न मिलने के कारण काम छोडकर चले गए।

नतीजा यह हुआ कि ढाबे में ताला पड़ गया। अब तो घर में फाका होने लगा। अब सोहनलाल काम-धंधे की तलाश के नाम पर सुबह घर से निकल जाता और शाम को न जाने कहां से शराब पीकर लौट आता। घर में दोनों मासूम बच्चे और कमला भूख से बिलखते रहते।

कुछ दिन तो कमला अड़ोस-पड़ोस से मांगकर बच्चों का पेट किसी प्रकार भरती रही, मगर आज तो पडोसियों ने भी नज़रें फेर लीं। आखिर कोई कब तक किसी पर दया कर सकता है?

रात होने पर बच्चे भूख से बिलख-बिलख कर सो गए। नशे में धुत्त सोहनलाल भी आकर सो गया और बेचारी कमला घर में बने मंदिर के सामने बैठी रात भर आंसू बहाती रही। उसका हदय बार-बार कह रहा था- है नारायणजी! यह मुझे किस पाप की सजा दे रहे हैं आप? प्रभु! मेरे परिवार पर आए इस संकट को टालो। आज मेरे बच्चे भूख से बिलखते हुए ही सो गए हैं, मेरा पति पथभ्रष्ट हो चुका है। हे लक्ष्मीपति! रक्षा करो… मेरे पति को सदृबुद्धि दो।

इसी प्रकार विनती करते वह कब सो गई, उसे स्वयं ही पता नहीं चला। सुबह जब उसकी आंख खुली तो देखा कि बच्चे सोए पड़े हैं, पति नहा-धो रहा था। कमला से उसकी नज़रें मिली तो उसने सिर झुका लिया, फिर कपड़े पहनकर खामोशी से बाहर चला गया। कमला हाथ-मुंह धोकर फिर से अपने नारायणजी के मंदिर के सामने जा बैठी। चेहरा घुटनों पर टिका लिया और; सोचने लगी कि क्या करूं? बच्चे उठकर नास्ता मांगेंगे तो क्या जवाब दूंगी? तभी दरवाजे पर दस्तक हुईं। सहमी हुई सी वह दरवाजे तक पहुंची और दरवाजा खोला तो एक साधु को अपने सामने खड़ा पाया।

कुछ भिक्षा दे बेटी। साधु ने कहा।

बाबा… मेरे घर में तो अन्न का एक दाना भी नहीं है। पास में एक फूटी कौडी तक नहीं। आपको क्या दूं? कहकर वह रो पड़ी।

बेटी! तेरे घर में धन पडा है और तू दुखी है! साधु ने कहा।

धन? मेरे घर में? बाबा! आप क्यों मुझ अभागी का उपहास कर रहे हैं।

में सच कह रहा हूं बेटी। अपने घर की दीवार पर टंगी नारायणजी की तस्वीर के पीछे देख, वहां तेरा पुराना बटुआ (पर्स) पड़ा है, जिसमें कुछ धन है और सुन, यदि बच्चों को पिता से कुछ लेना हो तो उम्हें मां को मनाना चाहिए। मां स्वयं पिता को मना लेती है। यह ले…। साधु ने अपने झोले में से एक पुस्तक निकालकर कहा… यह मां वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की पुस्तक है। तू मां लक्ष्मी की शरण में चली जा। मां तुझ पर अवश्य ही कृपा कोंगो और तेरा घर धन-धान्य से भर जाएगा।

मां वैभव लक्ष्मी की पुस्तक हाथ में आते ही कमला के शरीर में जैसै नईं शक्ति भर गई। वह बोली… बाबा! क्या सचमुच मां वैभव लक्ष्मी मेरी दरिद्रता दूर कर देंगी?

बेटी! जहां वैभव लक्ष्मी की कृपा होती है, वहां दुख-दरिद्गता ठहर नहीं पाती। तू पुस्तक में लिखी विधि के अनुसार मां का व्रत् कर, तेरा उद्धार होगा। नारायण… नारायण…।

कमला तो अपनी सारी सुध-बुध भूलकर पुस्तक के पृष्ठ पलटने लगी थी। अचानक उसके मन में आया कि यदि घर में धन है तो चाचा को खाली हाथ नहीं भेजना चाहिए। में अभी उन्हें कुछ देतो हूं। ऐसा सोचकर जैसे ही उसने नजरें उठाई तो अवाक रह गई। अभी क्षण भर पहले ही तो साधु बाबा उसके सामने ख़ड़े थे, मगा अब तो वहां दूर-दूर तक उनका पता ही नहीं था। मगर ‘ नारायण. नारायण ‘ के शब्द अभी भी उसके कानों में गूंज रहे थे।

कमला हत्प्रभ सी रह गई। तो क्या नारदजी मेरे नारायण का संदेश लेकर आए थे 2 जरूर यही बात है, सोचती हुईं कमला तेजी से पलटकर भीतर आईं और दीवार पर टंगी नारायणजी कौ तस्वीर के पीछे देखा तो सचमुच वहां उसका पुराना पर्स पड़ा था। कमला ने उसे खोलकर देखा तो उसमें सौ-सौ के पांच नोट रखे थे। खुशी के मारे उसका चेहरा दमकने लगा। एक नया उत्साह और फुर्ती आ गई उसके शरीर में। जल्दी-जल्दी उसने स्नान किया और पुस्तक पढने बैठ गई। पुस्तक में सबसे पहले उसने व्रत के नियम पढे और यह पढकर तो उसकी खुशी का ठिकाना ही न रहा कि मां वैभव लक्ष्मी का व्रत शुक्रवार से आरम्भ किया जाता है। यह संयोग ही था कि दिन शुक्रवार ही था। उसने स्नानादि से निवृत्त होकर नारप्यादुदु के सामने ही संकल्प लिया कि वह मां वैभव लक्ष्मी के इवकीस व्रत करेगी। उसके बाद वह चाजार गई और खाने-पीने व पूजा कर सामान लेकर आई।

उसने बच्चों क्रो जगाकर उम्हें नहलाबुलाकर नाश्ता दिया और फिर मां वैभव लक्ष्मी व्रत कथा के पुस्तक में लिखे नियमों के

हँ अनुसार व्रत किया। सारा दिन वह ‘जय मां वैभव लक्ष्मी ३-जय

मां वैभव लक्ष्मी ‘ का जाप करती रही। शाम के समय उसने विधिवत् मां का पूजन किया और प्रार्थना की-‘ हे मा! नारायणजी की आज्ञा

से मैंने आज से आपकी शेरण ली है। मेरी मनौती पूर्ण करना मां। मैं केवल इतना चाहती दूं कि मेरे पति को सदूबुद्धि आए और वै सभी दुर्मुणों को त्यागकर फिर से सतूमार्ग पर चलते हुए अपना काम करें। जय माँ वैभव लक्ष्मी, जय मां वैभव लक्ष्मी ! ‘

व्रत कथा कहकर उसने बच्चों क्रो चूरमा का प्रसाद दिया। अपने अडोस-पडोस में बांटा, फिर पति के इंतजार में पलकें बिछाकर बैठ गई। रात आठ बजे उसका पति अत्या। कमला क्रो यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि आज वह नशे में नहीं था।

कमला! आज तो चमत्कार हो गया। ईश्वर की कृपा से कल से ही मेरा ढाबा फिर से चालू हो जाएगा। आज लाला ने स्वयं बुलाकर कहा कि यदि मैं शराब और जुए की लत छोड र्दूतो वह मुझे फिर से आटा-दाल आदि उधार दे देगा और कमला मैंने आज सै ही कसम खा ली है कि मैं जीवन में कभी भी शराब और जुए की तरफ नहीं देखूंगा। ये सव तुम्हारे शुभ कर्मों का चमत्कार है ९’

नहीं स्वामी! यह सब मां वैभव लक्ष्मी का चमत्कार है ९’

मां वैभव लक्ष्मी का चमत्कार?

हां स्वामी! अब हम सब मां वैभव लक्ष्मी कौ शरण में हैं। आज़ ही मैँने मां वैभव लक्ष्मी का व्रत रखा है। मां वैभव लक्ष्मी सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। एक बार मां जिससे प्रसन्न हो जाती हैं, उसके जीवन में कभी भी दुख और दरिद्रता की छाया नहीं पड़ती। ”

‘ मगर तुम्हें यह सब बताया किसने 2 मेरा मन रोमांचित सा हो रहा है कमला। मुझे सब कुछ बताओ ! ‘

‘ आओ स्वामी. ॰ ॰ आओ. . . आप भी पहले मां का आशीर्वाद ले लें ! ‘ कमला उसे मंदिर के समीप ले गई। एक चौकी पर श्रीयंत्र के समक्ष मां वैभव लक्ष्मी की जोत अभी’ भी जल रही थी और जल के पात्र पर रखी कटोरी में घर का आखिरी गहना कमला की नाक

की सोने की कील पडी थी। सोहनलाल जैसै ही माता की जोत के सपक्ष गया, उसकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली और हाथ जोडकर वह बोलानं है मां वैभव लक्ष्मी ! मैं लोभ में फंसफा पथभ्रष्ट हो गया था। मैं बिना मेहनत किए ढेर रपारी दौलत पा लेना चाहता था, मैं समझ गया मां कि आपने मुझे मेरे लालच का ही दण्ड दिया था। हे मां ! अब मैं अपने परिवार सहित आपकी शरण में दूं. . हमारा उद्धार करो। हे मां ! मैं भी आज संकल्प करता हूँकिं अपनी पली के साथ आपके व्रत क्रो करूंगा। फिर दोनों ने मिलकर मां वैभव लक्ष्मी का प्रसाद ग्रहण किया १ दूसरे दिन सोहनलाल ने अपनी दुकान को झाड़-षोंछकर साफ किया ही था कि उसके पुराने कारीगर भी . वापस आ गए और दोपहर होते-होते ढाबा पहले की भांति चलने लगा। इसके बाद जब शुक्रवार आया तो पति-पत्सी ने मिलकर मां वैभव लक्ष्मी का व्रत किया। इस एक सप्ताह में सोहनलाल के घर की स्थिति तेजी से सुधरने लगी। अब सोहनलाल ने लोभ-लालच सव त्यागकर सब कुछ मां की मर्जी पर छोड दिया था। इसी प्रकार इवकीसबां शुक्रवार आया तो दोनों ने अपने सगे-संबंधियों को बुलाकर कथा कही। सात कन्याओँ का पूजन कर उन्हें भोजन कराया और उन्हें वैभव लक्ष्मी व्रत कथा की एकाएक पुस्तक भेंट की। इसके अतिरिक्त उन्होंने १ ० १ प्रतियां सभी श्रद्धालु भवतों में बांटीं। उसी दिन उन्होंने यह संकल्प भी लिया कि हम उम्र भर निष्काम भाव से मां वैभव लक्ष्मी का व्रत करते रहेंगे। बोलो, मां वैभव लक्ष्मी की जय ! कथा के चाद मां से इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए–‘ हे मां जिस प्रकार आपने कमला के मन क्री मुराद पूरी की ऐसे ही अपने सभी भक्तों की मुरादें पूरी करना। अपनी शरण में आए कौ रक्षा करना। सबको सुख-समृद्धि, धनधान्य और संतान देना। ‘ नीट : प्रार्थना के उपरान्त नीचे दिए गए श्लोक का उच्चारण करते हुए ध्यान और बाद में लस्सी चालीसा का पाठ अवश्य करें।

ठयान

या रवताम्बुजचासिनी विलसिनी चगडांशू तेजस्विनी।

था रचता रुयिराम्बरा हरिसखी या श्री मनोहादिनी।।

था रस्नाकरमन्थनात्पगटिता विष्पगेश्व या गेहिनी।

सा मां पड्डूमनोत्मा भगवती लश्मीश्च पत्मावती।।

भावार्थलाल कमल पर विराजमान हुँ जिनर्का कक्ति

अतुत्ननयि हैं, महान तेज वार्ता, जां समस्त स्कावर्णा (क्लाणी हैं, जो लाल वस्त्र धारण किएहुए हुँ धनवान विष्णु काँ अधाग्निठे सबके हृदय काँ आनन्द दैन वाली, समुद्र मंथन कॅ समय क्या सै फ्राट होने वालां) म्मावान विष्णु र्का पानश्चिठ आंबेश्य पूजनयि हैं. वं मां लस्सी र्मर्स रक्षा करें/

क्षमाँ मत्र स्तुति के उपरान्त पूजन में किसी भी प्रकार की त्रुटि रह जाने के लिए निम्न मंत्र द्वारा क्षमा याचना कों ८” आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि!

“हैं मां/ हैं यस्मेश्वर्स/ में आवाहन र्का विधि नहाँ जाक्ता विसर्जन र्का विधि मां नहाँ जानता, न हाँ पूजा आँ करना जानता हूं अतनु’ हैं मां/ वादें मैर? पूजा-अवंना, आवाहन या विसज’नशदि में कांर्द्ध त्रुटि रह यह’ हो, तो भुट्टो क्या करें/ ‘

मा के निवास स्थल

मां वैभव लस्सी किंर्ता पर्दान, सागर या कन्दराआँ आदि मै’ नहीं रहर्ताट्वें मां कॅ निवास कॅ कुछ नि/ठेचन स्थान हुँ जां मां द्वारा इस प्रकार वायेंति हैं .॰-

‘ जहां अतिथि सत्कार होता हो, सज्जनों की सेवाहो, धर्मंकार्यहॉ, प्रेम हो, सत्य का आचरण हो, जहां संतोषी स्वी और विनयी व कर्मशोलमुरुषरहत्तेहों, उन स्थानों का मैं कभी परित्याग नहीं करती । ‘

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